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Rajgir Brahmakund Crisis: राजगीर का ब्रह्मकुंड सूखने के कगार पर! बिहार की आस्था, पर्यटन और पर्यावरण पर मंडराया बड़ा संकट

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Alam Ki Khabar: बिहार के राजगीर में सदियों पुराने ब्रह्मकुंड समेत कई गर्म जलकुंडों की जलधारा कमजोर पड़ रही है। भूजल दोहन को इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है। जानिए क्या है पूरा मामला, प्रशासन की तैयारी और स्थानीय लोगों की मांग।

नालंदा, 11 जुलाई। आलम की खबर: बिहार के ऐतिहासिक और धार्मिक नगर राजगीर से ऐसी खबर सामने आई है जिसने करोड़ों श्रद्धालुओं, पर्यावरण प्रेमियों और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है। वैभारगिरी पर्वत की तलहटी में सदियों से बहने वाले पवित्र गर्म जलस्रोत अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। गंगा-जमुना कुंड, अनंत ऋषि कुंड, मार्कंडेय कुंड और व्यास कुंड के बाद अब सबसे प्रमुख ब्रह्मकुंड की जलधारा भी तेजी से कम होने लगी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो राजगीर की पहचान बने इन प्राकृतिक गर्म जलकुंडों का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ सकता है।

राजगीर केवल बिहार का पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सनातन, बौद्ध और जैन धर्म की साझा आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां गर्म जलकुंडों में स्नान करने पहुंचते हैं। विशेष रूप से मलमास मेला और सर्दियों के मौसम में इन कुंडों पर भारी भीड़ उमड़ती है। ऐसे समय में ब्रह्मकुंड की जलधारा कमजोर पड़ने की खबर ने स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कुंड परिसर के आसपास तेजी से होटल, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बने हैं। इनके लिए बड़ी संख्या में गहरे बोरवेल और सबमर्सिबल पंप लगाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक भूजल दोहन के कारण प्राकृतिक जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। यही जलस्तर गर्म चट्टानों से होकर इन कुंडों तक पहुंचता था। अब जलस्तर गिरने से गर्म जलधाराएं कमजोर होती जा रही हैं और कई कुंड लगभग सूखने की स्थिति में पहुंच चुके हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भूजल का अनियंत्रित दोहन नहीं रोका गया तो केवल ब्रह्मकुंड ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का प्राकृतिक जल तंत्र प्रभावित हो सकता है। इसका असर पर्यटन, स्थानीय रोजगार और धार्मिक गतिविधियों पर भी पड़ेगा। राजगीर की पहचान इन गर्म जलस्रोतों से जुड़ी हुई है और इनके समाप्त होने का अर्थ होगा सदियों पुरानी प्राकृतिक धरोहर का नुकसान।

इस मुद्दे पर अब स्थानीय लोग खुलकर सामने आ गए हैं। पंडा समाज, व्यवसायी, होटल संचालक और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि ब्रह्मकुंड परिसर के 500 मीटर के दायरे में संचालित सभी अवैध बोरवेलों को तत्काल सील किया जाए। साथ ही इस क्षेत्र में नए बोरवेल की अनुमति पूरी तरह बंद की जाए और वैज्ञानिक अध्ययन कर स्थायी समाधान निकाला जाए।

राजगीर नगर परिषद भी इस मामले को गंभीरता से ले रही है। नगर परिषद के सभापति पति सुवेंद्र राजवंशी ने कहा कि ब्रह्मकुंड और अन्य पवित्र जलकुंडों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि कुंड क्षेत्र के आसपास चल रहे निजी और व्यावसायिक बोरवेलों की पहचान कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। वहीं नालंदा जिला प्रशासन ने भी अवैध बोरिंग पर रोक लगाने और पूरे मामले की जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बोरवेल बंद करना पर्याप्त नहीं होगा। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जल संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी जैसी दीर्घकालिक योजनाओं को लागू करना भी आवश्यक होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में राजगीर की प्राकृतिक और धार्मिक पहचान को अपूरणीय क्षति हो सकती है।

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राजगीर के गर्म जलकुंड केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन अर्थव्यवस्था की मजबूत पहचान हैं। यदि प्राकृतिक जलस्रोतों की रक्षा के लिए समय पर वैज्ञानिक और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो नुकसान केवल एक कुंड का नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर का होगा। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अब प्रशासन और समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

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